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वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...

Posted On: 17 Aug, 2016 (1) में

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लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए

हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए

मुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभी
मुक्त हो धरती पवन आकाश नीला चाहिए

पीत सरसों, पीत चन्दन, खिल उठे सूरजमुखी
लहलहाता खेत हो परिधान पीला चाहिए

प्रेम निश्छल नैन पुलकित संतुलित सा आचरण
स्वप्न सत-रंगी सरल यौवन सजीला चाहिए

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा
चिर विजय की कामना हो कृष्ण लीला चाहिए

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

swapnmere के द्वारा
August 17, 2016

ये मरी पहली रचना है जागरण ब्लॉग पर … आशा है पाठकों को पसंद आएगी …


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